अंतर्द्वद्व…

कितना मैला हो गया हैं अब…
मेरे कमरे का वो आईना…
ना ठीक से मैं ख़ुद को देख पाता हूँ…
ना ठीक से वो ख़ुद नज़र आता हैं…

बस एक कोने में रहता हैं…मालूम हैं शायद उसे…
कि कोई और भी रहता हैं…उसके संग… उसी कमरे में…

ज़रा सी भी कोशिश नहीं करता…
ज़रा सी उम्मीद भी नहीं करता…
वो भी और मैं भी…एक द्वंद्व चलता हैं दरमियाँ…

वो कहता भी रहता हैं…
इंसान के पास कोई और ज़रिया ही नहीं…
ख़ुद को पहचानने का मेरे सिवाय…
और मुझे लगता हैं कि… उसे बनाया ही इंसान ने हैं…

अब ये फ़ैसला कौन करता… सिवाय हम दोनों के…
कि ज़रूरत तो हैं एक दूसरे की… बस कबूल नहीं करते…
तो बस एक इतवार मैंने उसे साफ़ ही कर दिया…
तो उसने भी मुझे अपना चेहरा दिखा दिया…

मुस्कुराया देख के ख़ुद को जब आईने में…
तो वो भी मुस्कुराने लगा मेरे संग में…
तब जाकर समझ आया मुझे…
ये अंतर्द्वंद्व ख़ुद से ही था मेरा…
आईना तो बस एक ज़रिया था…
~तरुण

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