परिंदे के परों से...टूट कर वो ज़मीं पर गिर गयी...लगी हाथ जब इंसानों के...तो एक कलम बन गयी... नब्ज़ में अपनी, स्याही भरकर...वो काग़ज़ पर उतर गयी...इंसान के ख़्यालों का वो...एक ज़रिया सा बन गयी... कहानियाँ...नज़्में और किस्से...बेपरवाह लिखती गयी...लगा उसको फ़िर से, जैसे...एक नयी ज़िंदगी मिल गयी... कश्मकश भी कुछ ऐसी थी...उस पंख के... Continue Reading →
जनहित में जारी…
एक बात कुछ यूं हैं म्हारी... जो करनी हैं जनहित में जारी...दुनिया ने की हैं तैयारी...आयी हैं अब कोरोना री बारी...ना रण हैं ना अस्त्र कोई... हैं वो फ़रिश्ता या इंसान कोई... डॉक्टर कहो उसे या कहो पुलिस... लड़ाई उनकी अब तक हैं जारी... हिम्मत हैं उनकी जो नहीं हैं हारी... रात और दिन का... Continue Reading →
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