Tera Shahar

#tarunsays #spillpoetry #hindi Naa Jane kyu ye Shahar anjana sa lagta hai... Aaya tha aaj jab mein tere shahar... Kuch thik nahi tha uska mizaz... Galiyon ka sannata sab kuch bayaan kar raha tha... Bachpan ka shor,ab Nazar nahi aa raha tha...

समंदर…

समंदर को भी कभी... अपनी महफ़िल में शरीक होने दो... वो खारा भी हैं और गहरा भी हैं... एक जाम पिलाकर कभी... उसको भी तो बहकने दो... एक घूंट लेहरों संग लेकर कभी... खुद को भी किनारे पर झूमने दो... चंद लफ़्ज़ों की शिकायत से ही सही... कभी तो उस चाँद को भी रूठने दो...... Continue Reading →

किनारे तक…

किनारे तक आते आते... शायद लेहरों को ये एहसास हो जाता है... कि कैसे जाये वो दूर उस सागर से... जिसके बिना उसका कोई वजूद नहीं... इसलिए लौट जाती हैं वापस... किनारे तक आते आते... ~तरुण

Ramadan…

सजदे मे खुदा के... चल आज इबादत करते हैं... सहरी से इफ्तारी तक... चल आज दुआएं लेते हैं... चाँद कभी अधूरा भी होगा... किसी रात वो पूरा भी होगा... चल आज नमाज़ी बनकर... उस ख़ुदा से मिलते हैं... ~तरुण

Joker…

किसी को याद है... ताश के पत्तों का वो जोकर... जिसे सबसे पहले ढूंढते हैं... बाहर निकाल के रखने के लिए... और भूल जाते हैं... मगर वही जोकर तमाशा देखता है... बाज़ीयों में उलझे बादशाह को... जो एक इक्के से हार जाता है... ~तरुण

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