सुकूं…

ना जाने क्यूँ... सुकूं को ढूँढती...हर वो एक शक़्ल...शाम होते होते...फ़िर से उलझ जाती हैं...किसी की तलाश में...रात भर भटकती हैं...सुबह होते होते...थक हार कर...फ़िर से निकल पड़ती हैं...एक नयी सी शक़्ल लेकर... उसी सुकूं को ढूँढने...~तरुण

लिबास…

लिखकर ख़्वाब को एक चिट्टी में...उनके लिबास में छुपाया हैं...जो कुछ भी कहना था उनसे...सब उसी ख़त में समाया हैं...अब इन्तजार रहेगा उनका...उस लिबास में आने का...लिखा हुआ हैं जो ख़त में...उसे संग साथ संजोने का...फ़िर एक दिन उनको देखा...उसी लिबास को पहने हुए...वो पास से गुज़रे जैसे...और हम थे पूरे सहमे हुए...एक टूक भी... Continue Reading →

आवाज़…

कितना शोर हैं इस शहर में…फ़िर भी हम ख़ामोशी से रह लेते हैं…तू मिला था या मिलेगा कभी…इसी उम्मीद से जी लेते हैं…अब कौनसा मुक़ाम बाकी हैं…जो हासिल करने जाऊँ मैं…इस समंदर सा ठहर गया हुआ हूँ…अब क्यूँ किनारे पर जाऊँ मैं…यूँ तो मिल जाती हैं कई मंजिलें मग़र…अब क्यूँ तेरे पास आऊँ मैं…तुझे तो... Continue Reading →

ख़ुमार…

कि देखूँ कभी जो आईने में…और वो नज़र आ जाए…कि निकलूँ कभी जो बाज़ार में…और वो नज़र आ जाए…ये कैसी ख़ुमारी हैं…जो आ लगी हैं मुझे…ये कैसा पर्दा हैं…जो पड़ा हैं नज़र पे मेरे…वो सचमुच सामने हैं नज़र के मेरे…या सचमुच का इश्क़ हुआ हैं मुझे…~तरुण

Start a Blog at WordPress.com.

Up ↑