ख़ुमार…

कि देखूँ कभी जो आईने में…और वो नज़र आ जाए…कि निकलूँ कभी जो बाज़ार में…और वो नज़र आ जाए…ये कैसी ख़ुमारी हैं…जो आ लगी हैं मुझे…ये कैसा पर्दा हैं…जो पड़ा हैं नज़र पे मेरे…वो सचमुच सामने हैं नज़र के मेरे…या सचमुच का इश्क़ हुआ हैं मुझे…~तरुण

इश्किया…

आज बड़ी ही मुश्किल से...एक नज़्म बन पाई हैं...तेरे शहर की हवा आज...मेरे घर की तरफ़ आई हैं...सोच रहा हूँ कि... संग हो जाऊँ मैं इन हवाओं के...और घूम आऊँ सारा शहर भर... और जब लौटेगी यहीं हवाएँ... तेरे शहर की ओर... सोच रहा हूँ कि... इनमे इश्क़ भर दूँ इतना... कि तेरे शहर तक... Continue Reading →

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