बचपन…

चलो आज फ़िर से एक पतंग लूटते हैं...जो खो गया हैं बचपन... उसे फ़िर से ढूंढ़ते हैं...शायद संजो के रखा हैं हम सबने उसे... चलो आज फ़िर से बचपन की वो संदूक खोलते हैं... देखो ज़रा उसमें क्या क्या मिलता हैं... यादों का जैसे एक पिटारा सा खुलता हैं... एक गिल्ली रखी हुई हैं टूटी... Continue Reading →

सुकूं…

ना जाने क्यूँ... सुकूं को ढूँढती...हर वो एक शक़्ल...शाम होते होते...फ़िर से उलझ जाती हैं...किसी की तलाश में...रात भर भटकती हैं...सुबह होते होते...थक हार कर...फ़िर से निकल पड़ती हैं...एक नयी सी शक़्ल लेकर... उसी सुकूं को ढूँढने...~तरुण

लिबास…

लिखकर ख़्वाब को एक चिट्टी में...उनके लिबास में छुपाया हैं...जो कुछ भी कहना था उनसे...सब उसी ख़त में समाया हैं...अब इन्तजार रहेगा उनका...उस लिबास में आने का...लिखा हुआ हैं जो ख़त में...उसे संग साथ संजोने का...फ़िर एक दिन उनको देखा...उसी लिबास को पहने हुए...वो पास से गुज़रे जैसे...और हम थे पूरे सहमे हुए...एक टूक भी... Continue Reading →

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