फ़िर वहीँ निशाँ…

मैं फ़िर लौट आया हूँ...तेरे ही साहिल पर...एक बरस के बाद...होगी गुफ़्तगू थोड़ी सी...आज तो तेरे साथ...निशाँ छोड़े थे कुछ मैंने...मिटा दिए हैं जो तूने... अपनी लहरों के साथ...मैं फ़िर छोड़ जाऊंगा...तेरे लिए वहीं एक काम...तू मिटाते रहना फ़िर से...अपनी लहरों के साथ...मैं बनाता रहूँगा...जब भी लौट कर आऊंगा... अपनी लकीरों से... फ़िर वहीँ निशाँ...~तरुण

माँ…

माँ, मुझे इतना ज़रूर मालूम हैं कि...मेरी कहानी को लिखा तुने हैं...एक नेक शुरुआत के साथ...मग़र इसका अंत कहा होगा ये नहीं मालूम...और शायद तुझे भी नहीं मालूम होगा ना...अगर होगा भी तो, तू बताएगी थोड़ी ना...माँ जो हैं तू... अंत से बढ़कर अनंत तक... माँ, इस घर में तुम हो, पापा हैं, बहने भी... Continue Reading →

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