आवाज़…

कितना शोर हैं इस शहर में…फ़िर भी हम ख़ामोशी से रह लेते हैं…तू मिला था या मिलेगा कभी…इसी उम्मीद से जी लेते हैं…अब कौनसा मुक़ाम बाकी हैं…जो हासिल करने जाऊँ मैं…इस समंदर सा ठहर गया हुआ हूँ…अब क्यूँ किनारे पर जाऊँ मैं…यूँ तो मिल जाती हैं कई मंजिलें मग़र…अब क्यूँ तेरे पास आऊँ मैं…तुझे तो... Continue Reading →

ख़ुमार…

कि देखूँ कभी जो आईने में…और वो नज़र आ जाए…कि निकलूँ कभी जो बाज़ार में…और वो नज़र आ जाए…ये कैसी ख़ुमारी हैं…जो आ लगी हैं मुझे…ये कैसा पर्दा हैं…जो पड़ा हैं नज़र पे मेरे…वो सचमुच सामने हैं नज़र के मेरे…या सचमुच का इश्क़ हुआ हैं मुझे…~तरुण

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