एक परिंदा शाम होते होते...एक दहलीज़ पर आकर रूक गया...कुछ ना पाया आसमाँ में शायद...फ़िर ज़मीं पर लौट गया... वहाँ उसने एक पिंजरें को देखा...पिंजरें में एक परिंदे को देखा...परिंदे को दाना चुगते देखा...फ़िर उसने आसमाँ को देखा... फ़िर उसने एक फ़ैसला लिया...पिंजरें के पास जाने का...भूख का मारा था वो शायद...वही एक चारा था... Continue Reading →
बारिश और मैं…
एक आह सी निकल जाती हैं...जब बारिशें मुझे बुलाती हैं...भीगने को... झूमने को...हर बार की तरह... मग़र इस बार तेरे बग़ैर...फ़िर भी जाता हूँ मैं...उस बारिश में...भीगने को...झूमने को...ताकि इस बारिश को... यूं ना लगे कि...हम साथ नहीं हैं...वो पूछती हैं...जब देखती हैं तू नहीं हैं साथ...वो बस आ ही रही हैं...बस थोड़ी देर के... Continue Reading →
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