मुलाकात…

उगते हुए सूरज की रोशनी में…एक नयी ज़िंदगी ढूंढता हूँ…पत्तों पर पड़ी औंस की बूँदों से…उनका हाल पूछता हूँ…रास्तों पर भटकते हुए फूल के…खिलने का इंतज़ार करता हूँ…कोई मिल जाए अजनबी तो उससे…बेहिसाब बातें करता हूँ…टकरा जाऊ ग़र सर्द हवाओं से तो…उनका ठिकाना पूछता हूँ…बादल में ग़र छुपी हूयी हो बारिश…तो बरसने को कहता हूँ…ईधर... Continue Reading →

वो झुमका…

आज ना बाज़ार में घूमते हुए…उसी पुरानी दुकान के बाहर…एक फेरी वाले के पास…मुझे एक झुमका दिखा…हूबहू जो तुझे चाइये था…तब नहीं ख़रीद पाया था ना…जेब ख़ाली ख़ाली जो रहता था…मग़र आज तो मैंने ख़रीद ही लिया उसे…बिना कुछ सोचे समझे…पूछने पर पता लगा कि…क़ीमत ज़्यादा नहीं थी उसकी…या शायद अब उतना फर्क़ नहीं पड़ता…ले... Continue Reading →

ठोकर…

जिंदगी का सबक भी ठोकरों से ही मिलता हैं...दिल पे घाव भी अपना ही तो देता हैं...अक्सर सही और ग़लत की जंग में...कभी कभी कोई इंसान टूट जाता हैं...किसी को तक़दीर से खूब मिलता हैं...तो कोई अपनी तक़दीर ख़ुद लिखता हैं...फ़िर क्यूँ इंसान, इंसान को तराजू में तौलता हैं...कहते हैं करम का लेखा-जोखा होता हैं... Continue Reading →

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