रास्ता…

मुश्किल हो जाता हैं कभी कभी…उन रास्तों पर चलना…जहाँ किसी के साथ होने का…एक एहसास रहता हैं… टूटे बिखरे ही सही…किसी के कदमों का…एक निशाँ रहता हैं… और भी मुश्क़िल हो जाता हैं…जब वो रास्ता घर की…दहलीज़ से गुजरता हैं… और नामुमकिन सा लगता हैं…जब ये मालूम हो कि…उस रास्ते से अब कभी भी…वो लौटता... Continue Reading →

अंतर्द्वद्व…

कितना मैला हो गया हैं अब...मेरे कमरे का वो आईना... ना ठीक से मैं ख़ुद को देख पाता हूँ... ना ठीक से वो ख़ुद नज़र आता हैं...बस एक कोने में रहता हैं...मालूम हैं शायद उसे...कि कोई और भी रहता हैं...उसके संग... उसी कमरे में...ज़रा सी भी कोशिश नहीं करता...ज़रा सी उम्मीद भी नहीं करता...वो भी... Continue Reading →

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