बगिया…

कुछ धुँधला सा तो भी याद हैं क्या तुझे…मुझे तो सब कुछ याद हैं…वैसा का वैसा ही…वो गंगा किनारे किसी घाट से होते हुए…बनारस की तंग गलियों से गुज़रते हुए…मंदिरों की चौखटो को पार करके…एक छोटी सी बगिया हुआ करती थी…जहा की छांव में अक्सर…तू और मैं मिला करते थे…ज्यादा तो कुछ था नहीं वहां…बस... Continue Reading →

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