बचपन…
चलो आज फ़िर से एक पतंग लूटते हैं...जो खो गया हैं बचपन... उसे फ़िर से ढूंढ़ते हैं...शायद संजो के रखा हैं हम सबने उसे... चलो आज फ़िर से बचपन की वो संदूक खोलते हैं... देखो ज़रा उसमें क्या क्या मिलता हैं... यादों का जैसे एक पिटारा सा खुलता हैं... एक गिल्ली रखी हुई हैं टूटी... Continue Reading →
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