आज फ़िर तुझे एक ख़त लिख रहा हूँ…
आज फ़िर तुझे एक ख़त लिख रहा हूँ...किसी उम्मीद से नहीं... बस यूँही लिख रहा हूँ...कहते हैं नया साल आया हैं...तो नयी कलम से नये पन्ने पर...नये एहसास को लिये ये ख़त लिख रहा हूँ...मालूम तो हैं ही मुझे... तू ठीक ठाक होगी...फ़िर भी शुरू करने के लिए तेरा हाल पूछ रहा हूँ...ठीक हुँ मैं... Continue Reading →
बगिया…
कुछ धुँधला सा तो भी याद हैं क्या तुझे…मुझे तो सब कुछ याद हैं…वैसा का वैसा ही…वो गंगा किनारे किसी घाट से होते हुए…बनारस की तंग गलियों से गुज़रते हुए…मंदिरों की चौखटो को पार करके…एक छोटी सी बगिया हुआ करती थी…जहा की छांव में अक्सर…तू और मैं मिला करते थे…ज्यादा तो कुछ था नहीं वहां…बस... Continue Reading →
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