बचपन…
चलो आज फ़िर से एक पतंग लूटते हैं...जो खो गया हैं बचपन... उसे फ़िर से ढूंढ़ते हैं...शायद संजो के रखा हैं हम सबने उसे... चलो आज फ़िर से बचपन की वो संदूक खोलते हैं... देखो ज़रा उसमें क्या क्या मिलता हैं... यादों का जैसे एक पिटारा सा खुलता हैं... एक गिल्ली रखी हुई हैं टूटी... Continue Reading →
कशमकश…
इंतज़ार सबका एक जैसा नहीं होता…उनको भी था एक वक़्त तक…हमको भी था कुछ वक़्त तक…शायद थोड़ा सा तो आजतक भी हैं…मग़र अब किसी के लौट आने का नहीं हैं…ना ही किसी से मिलने का मन भर हैं…. अब इंतज़ार हैं एक उम्मीद का... अब वक़्त आगे निकल गया हैं…और साथ साथ हम भी कहीं... Continue Reading →
Recent Comments