नज़्म 3 📝

1.
उस पतंग की बादशाहत भी क्या होगी…
जो एक डोर के भरोसे आसमाँ से बग़ावत करती हैं…

2.
लगता है लेहरों से सीखी है उसने मोहब्बत…
जो लौट के तो आती है मगर ठहरती नहीं…

3.
लौट के फ़िर आया हैं एक अरसे के बाद…
वहीं रास्ता, वहीं मकान, और वहीं बचपन…

4.
अधूरे इश्क़ की भी एक कशिश होती हैं…
जो पुरा होने की कोशिश हर रोज़ करती हैं…

5.
ना जाने क्या इशारा कर रहीं हैं ये ज़िंदगी…
परिंदा बनाकर, पर छिन रहीं हैं ये ज़िंदगी…

6.
नज़्म नज़्म जोड़ कर लिखा हैं तुझे…
बिखरेगा भी तो नज़्म बनकर ही…

7.
साल का पन्ना तो बदल गया हैं आज…
मगर आरजू वहीं की वहीं…

8.
उन ख़्वाबों का आज तक शुक्रगुज़ार हु मैं…
जहां सिर्फ़ और सिर्फ़ तेरी हुक़ूमत थी…

~T@ROON 📝

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