ज़िंदगी का सफ़र…

अनबन हुयी कुछ बादलों से…
तो बरस गई ये बारिशें…
वो अपने घर में धूप लाने…
उलझ गया यूँ सूरज से…
फ़िर देख रात में चाँद को…
उसने वहीँ पैंतरा आज़माया…
घूरते घूरते चाँद को एक टूक…
वो सुर्ख़ लाल ही कर पाया…
फ़िर पड़ी उसकी हठी नज़रे…
अनगिनत सितारों पर…
टूटते देख उनमें से एक को…
फ़िर उसको ये सवाल आया…
क्या हैं यहां जो हैं निरंतर…
और क्या हैं यहां जो हैं नश्वर…
यूँही उलझता रहा वो इस जग की…
सीधी साधी पहेलियों में…
झांका उस दिन अपने मन की…
बंधी हुयी कुछ गठरीयों में…
ख़ुद ही में हैं निरंतर यहां…
और ख़ुद ही हैं यहां नश्वर भी…
सुलझ गई जब ये पहेली…
जिंदगी बन गई उसकी सहेली…
~तरुण

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