कच्ची उम्र…

माना कच्चे थे वो सारे वादे…और कच्ची थी वो उम्र….
निभाते तो तब भी थे… और निभाएंगे अब भी हम…
सोच के भी यही सोचा… कि अब कह दे उनसे हम…
जब गए यही बात करने…उनके घर पर हम…
फ़ासले इतने ज़्यादा थे…जितनी नहीं थी उम्र…
बदल गयी थी सूरत उनकी…बस न बदले थे हम…
कहने की जब बारी आयी… उसने एक तस्वीर दिखाई…
तस्वीर में जब देखा हमने… उसको किसी के संग…
खुश थे वो हाथ थामे… एक दूसरे के संग…
सोचा एक दफ़ा फ़िर हमने… और पी गए सारे गम…
टूट गए वो कच्चे वादे… बस रह गयी वो कच्ची उम्र…
~तरुण

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