ठोकर…

जिंदगी का सबक भी ठोकरों से ही मिलता हैं…
दिल पे घाव भी अपना ही तो देता हैं…
अक्सर सही और ग़लत की जंग में…
कभी कभी कोई इंसान टूट जाता हैं…

किसी को तक़दीर से खूब मिलता हैं…
तो कोई अपनी तक़दीर ख़ुद लिखता हैं…
फ़िर क्यूँ इंसान, इंसान को तराजू में तौलता हैं…

कहते हैं करम का लेखा-जोखा होता हैं कहीं…
शायद कोई ख़ुदा रहता होगा कहीं…
अगर बस में होता ये काम भी इन्सां के…
तो वक़्त हिसाब किताब किसका करता…

तमाशा बना देते हैं लोग अच्छी खासी ज़िन्दगी को…
उलझते रहते हैं ख़ुद से बंधी बेड़ियों से…
ग़र कोई कोशिश भी करे खोलने की…
उसको भी जकड़ के रख देते हैं लोग…
~तरुण

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